प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कई निर्देशों और न्यायिक आदेशों के बावजूद प्रिंटेड प्रोफार्मा पर सम्मन जारी करने को गम्भीरता से लिया है। साथ ही बुलंदशहर के एसीजेएम के ऐसे ही आदेश पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि न्यायाधीश ही गलती करेंगे तो आम जनता को न्याय कैसे मिलेगा। यह आदेश न्यायमूर्ति मंजूरानी चौहान ने बुलंदशहर के राहुल व तीन अन्य की याचिका पर अधिवक्ता महेश शर्मा को सुनने के बाद याचिका स्वीकार करते हुए दिया है।कोर्ट ने जिला जज बुलंदशहर को संबंधित मजिस्ट्रेट से स्पष्टीकरण लेकर सूचित करने का निर्देश दिया था। मजिस्ट्रेट ने अपने स्पष्टीकरण में गलती मानकर बिना शर्त माफी मांगी।
कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट का स्पष्टीकरण स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि न्यायाधीश भगवान की तरह होते हैं। उन्हें जल्दबाजी या काम की अधिकता के कारण गलती नहीं करनी चाहिए। यदि न्यायाधीश गलती करेंगे तो आम जनता को न्याय कौन देगा। कोर्ट ने प्रिंटेड प्रोफार्मा पर जारी सम्मन आदेश रद्द कर दिया है और नए सिरे से सकारण दो माह में नया आदेश जारी करने का निर्देश दिया है।
अधिवक्ता महेश शर्मा का कहना था कि बुलंदशहर के अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कक्ष संख्या एक ने सात सितंबर 2020 को न्यायिक विवेक का प्रयोग किए बगैर याचियों को प्रिंटेड प्रोफार्मा पर सम्मन जारी किया है। याचिका में इस सम्मन आदेश को रद्द करने की मांग की गई। एडवोकेट महेश शर्मा का कहना था कि हाईकोर्ट की कई पीठों ने आदेश किया है कि कोई भी सम्मन प्रिंटेड प्रोफार्मा पर नहीं जारी किया जाएगा। साथ ही सम्मन जारी करते समय ऐसा करने का कारण स्पष्ट किया जाएगा।