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साहित्यकार, पत्रकार, संपादक, पटकथा लेखक कमलेश्वर को केवल लेखक कह देना उनके व्यक्तित्व को सीमित करना होगा। वे साहित्य की दुनिया में एक जीवंत आंदोलन थे, दूरदृष्टि से भरे चिंतक थे और भारतीय टेलीविजन में रचनात्मक क्रांति की नींव रखने वालों में अग्रणी भूमिका निभाने वाले व्यक्तित्व थे। आज कमलेश्वर की पुण्यतिथि है। इस अवसर पर उनके जीवन और सृजन पर एक नजर डालते हैं।

उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में 6 जनवरी 1932 को जन्मे कमलेश्वर प्रसाद सक्सेना का बचपन उस दौर में बीता जब भारत अपनी आजादी की लड़ाई लड़ रहा था। मैनपुरी के ग्रामीण परिवेश ने उन्हें मिट्टी की सोंधी खुशबू और समाज की कड़वी सच्चाई, दोनों से रूबरू कराया। 1948 में उनकी पहली कहानी 'कामरेड' छपी, जिसने साफ कर दिया कि यह युवा लेखक केवल शब्दों से खेलने के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था से टकराने के लिए पैदा हुआ है।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय उनके लिए 'साहित्य का मक्का' साबित हुआ, जहां निराला और पंत जैसे दिग्गजों की छाया में कमलेश्वर ने 'बदनाम गली' जैसा उपन्यास लिखकर अपनी धमक दर्ज कराई।

नई दिल्ली: हिंदी के अप्रतिम कथाकार, ‘पहल’ पत्रिका के संपादक ज्ञानरंजन के निधन के साथ हिन्दी कहानी में प्रगतिशील चेतना और साहित्यिक पत्रकारिता के एक युग का अवसान हो गया। ‘पहल’ पत्रिका के आधिकारिक फ़ेसबुक पेज ने उनके निधन की सूचना साझा की।

ज्ञानरंजन का निधन 7 जनवरी की रात 10.30 बजे जबलपुर के एक अस्पताल में हुआ, जहां सुबह ही उन्हें इलाज के लिए भर्ती किया गया था। वह 90 वर्ष के थे। उनकी पहचान जितना उनकी कहानियों से होती है, उससे कहीं ज्यादा उस ‘पहल’ पत्रिका के लिए जिसका ध्येय वाक्य ही था “इस महादेश के वैज्ञानिक और प्रगतिशील वैचारिक विकास के लिए”। साठ के दशक में शुरू हुई यह पत्रिका अपने समय में देश की प्रगतिशील चेतना का सशक्त स्वर भी थी और प्रेरणा भी।

ज्ञानरंजन को एक अप्रतिम कथाकार, सशक्त गद्यकार और यशस्वी संपादक के रूप में जाना जाता है।

रायपुर: भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रसिद्ध साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल का मंगलवार शाम को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में निधन हो गया। वह 89 वर्ष के थे।

उनके पुत्र शाश्वत शुक्ल ने उनके निधन की पुष्टि करते हुए बताया कि सांस लेने में तकलीफ होने के बाद शुक्ल को इस महीने की दो तारीख को रायपुर के एम्स में भर्ती कराया गया था। आज शाम 4.48 बजे में उन्होंने अंतिम सांस ली। शुक्ल के परिवार में उनकी पत्नी, बेटा शाश्वत और एक बेटी है।

साहित्य जगत में गूंजने वाली धीमी आवाज खामोश

शाश्वत ने बताया कि शुक्ल के पार्थिव शरीर को पहले उनके निवास स्थान ले जाया जाएगा। उनके अंतिम संस्कार के संबंध में जल्द ही जानकारी दी जाएगी। शाश्वत शुक्ल ने बताया कि अक्टूबर माह में सांस लेने में हो रही तकलीफ के बाद शुक्ल को रायपुर के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। तबीयत में सुधार होने के बाद उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई थी तब से वह घर पर ही इलाज करा रहे थे।

(पुष्परंजन): पूरी पाण्डुलिपि पढ़ना, और फ़िर उसका रिव्यू लिखना, मेरे लिए पर्वतारोहण से कम नहीं था। बीच-बीच में तगादा, " क्या किया? पढ़े कि नहीं? प्रिंटिंग के लिए भेजना है..." तब कवि सुधीर सक्सेना, मुझे काबुली पठान से कमतर नहीं लगते। आप में से कुछ ने संभवतः कार्ल मार्क्स की प्रेम कवितायेँ पढ़ी होंगी। तीन वॉल्यूम में दास कैपिटल लिखा था, उसके बरक्स पांच वॉल्यूम में हैं कार्ल मार्क्स के 'लव पोयम्स'. मार्क्स ने अपनी ज़हीन- ख़ूब-रू पत्नी, "जेनी फॉन वेस्टफालन" के लिए प्रेम कवितायेँ तब लिखी थीं, जब जर्मन रोमांटिसिज़म उरूज़ पर था।

पत्नी के लिए प्रेम कविताएँ उतनी ही निजी होती हैं, जितनी कि बेडरूम की बातें। लेकिन, पत्नीत्तर कविताएँ गढ़ने का साहस कवि करे, तो पढ़ना दिलचस्पी का विषय हो जाता है। उसे परस्त्रीगमन की दृष्टि से नहीं, भावनाओं के स्थानांतरण की दृष्टि से देखिये, और समझिये। कवि ने आरम्भ में ही साफ़-गोई से अपनी बात कह दी थी, " ये कवितायेँ तुम्हें/ जिसे प्रेम किया/ और, उन्हें भी जिन्हें चाहा/ कि उनमें भी तुम्हारा ही अक्स था।" यों, हिंदी साहित्य में ऐसे अभिनव प्रयास होते रहना चाहिए।

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