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(पुष्परंजन): पूरी पाण्डुलिपि पढ़ना, और फ़िर उसका रिव्यू लिखना, मेरे लिए पर्वतारोहण से कम नहीं था। बीच-बीच में तगादा, " क्या किया? पढ़े कि नहीं? प्रिंटिंग के लिए भेजना है..." तब कवि सुधीर सक्सेना, मुझे काबुली पठान से कमतर नहीं लगते। आप में से कुछ ने संभवतः कार्ल मार्क्स की प्रेम कवितायेँ पढ़ी होंगी। तीन वॉल्यूम में दास कैपिटल लिखा था, उसके बरक्स पांच वॉल्यूम में हैं कार्ल मार्क्स के 'लव पोयम्स'. मार्क्स ने अपनी ज़हीन- ख़ूब-रू पत्नी, "जेनी फॉन वेस्टफालन" के लिए प्रेम कवितायेँ तब लिखी थीं, जब जर्मन रोमांटिसिज़म उरूज़ पर था।

पत्नी के लिए प्रेम कविताएँ उतनी ही निजी होती हैं, जितनी कि बेडरूम की बातें। लेकिन, पत्नीत्तर कविताएँ गढ़ने का साहस कवि करे, तो पढ़ना दिलचस्पी का विषय हो जाता है। उसे परस्त्रीगमन की दृष्टि से नहीं, भावनाओं के स्थानांतरण की दृष्टि से देखिये, और समझिये। कवि ने आरम्भ में ही साफ़-गोई से अपनी बात कह दी थी, " ये कवितायेँ तुम्हें/ जिसे प्रेम किया/ और, उन्हें भी जिन्हें चाहा/ कि उनमें भी तुम्हारा ही अक्स था।" यों, हिंदी साहित्य में ऐसे अभिनव प्रयास होते रहना चाहिए।

नई दिल्ली: दिल्ली स्थित राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) के सम्मुख सभागार में मिथिला महोत्सव 8 का आयोजन हुआ। जिसमें बाबा नागार्जुन की जीवनी और उनके साहित्य पर व्यापक परिचर्चा आयोजित की गई। मैथिल पत्रकार ग्रुप, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और मैथिली-भोजपुरी अकादमी के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम में साहित्यकारों, पत्रकारों और राजनीतिक नेताओं ने बाबा नागार्जुन की साहित्यिक धरोहर और समाज में उनके योगदान पर अपने विचार साझा किए।

कार्यक्रम में बाबा नागार्जुन की लिखी हुई कविताओं का पाठ किया गया। इसमें वरिष्ठ पत्रकार दीपक कुमार झा, नरेंद्र नाथ, रहमतुल्लाह, काजल लाल, संजीव सिन्हा, प्रतिभा ज्योति, सुजीत ठाकुर, क्रांति संभव, सुभाष चंद्र, रोशन कुमार और स्कूली छात्रा प्रत्यूषा ने भागीदारी की। इस अवसर पर वरिष्ठ रंगकर्मी प्रकाश झा ने भी बाबा नागार्जुन की कविताओं को अपनी विशेष प्रस्तुति से जीवित किया।

परिचर्चा में भाग लेते हुए वरिष्ठ पत्रकार नरेंद्रनाथ, सुजीत ठाकुर, सुभाष चंद्र, रहमतुल्लाह और रौशन झा ने बाबा नागार्जुन की जीवनी पर चर्चा की।

(पुष्प रंजन) बांग्लादेशी कवि, लेखक, स्तंभकार, फ़ार्मासिस्ट, मानवाधिकार कर्मी, और परिवेशवादी फ़रहाद मज़हर 77 साल के हैं। बहुत से लोग उन्हें रैडिकल मानते हैं। मैं इससे पूरा इत्तेफ़ाक़ रखता हूँ। वो हैं रैडिकल। फ़रहाद मज़हर की शख्सियत स्वतंत्र विचारक से अधिक, विद्रोही के रूप में रही है।

1995 में ख़ालिदा ज़िया सरकार की आलोचना करने के कारण जब उन्हें जेल में डाला गया था, तब फ्रांसीसी दार्शनिक जैक्स देरिदा, और बंगाली लेखिका महाश्वेता देवी जैसे लोगों ने उनकी रिहाई की मांग करते हुए पत्र लिखे थे। मैंने फ़रहाद मज़हर को तभी जाना था। 1995 में जब जेल से छूटे, फ़रहाद मज़हर की उसी साल एक किताब आई, 'राजकुमारी हसीना'। शेख हसीना तब प्रधानमंत्री नहीं बनी थीं।

लेकिन, इस किताब ने शेख हसीना को बीच बहस में ला खड़ा किया था। जून 1996 में जब शेख हसीना सत्ता में आईं, फ़रहाद मज़हर उनके 'गुड बुक' में शामिल हो चुके थे। शेख हसीना शासन पार्ट वन- 1996 से 2001 तक फरहाद मज़हर उनसे रिश्ते निभाते रहे।

नई दिल्ली: हिंदू कॉलेज ने हमें उड़ान भरने के लिए पंख दिए। इतने वर्षों बाद भी यह अहसास रोमांचित कर देता है कि मैं इस कालेज की छात्रा रही हूं।' सुप्रसिद्ध लेखिका ममता कालिया ने हिंदू कालेज की स्थापना के 125 वर्ष की महोत्सव शृंखला में आयोजित कलमकारी उत्सव में कहा कि यहां के अध्यापकों और शिक्षा के वातावरण ने उनके लेखन को बड़ा आधार दिया है। कालिया ने हिंदू कॉलेज में अपने दाखिले का संस्मरण भी सुनाया जिसे उन्होंने अपनी किताब कितने शहरों में कितनी बार में भी लिखा है।

इस कलमकारी उत्सव में ऐसे लेखकों को आमंत्रित किया गया था जो हिंदू कालेज से पढ़े हैं। आयोजन में भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने देशबंधु कालेज से हिंदू कालेज की अपनी यात्रा के रोचक संस्मरण सुनाए। उन्होंने अपनी सद्य प्रकाशित पुस्तक ऑर्डनरी लाइफ का उल्लेख करते हुए बताया कि इस कालेज के वातावरण ने उन्हें प्रशासनिक अधिकारी होने के साथ कलमकारी की भी प्रेरणा दी।

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