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(आशु सक्सेना) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी स्थापना के 100 वें वर्ष की ओर अग्रसर है। आरएसएस की स्थापना विजयदशमी के दिन 1925 में हुई थी। सही मायनों में इस संगठन का अंकुर 1920 में रोपा गया था, जो 1925 में एक पौधें की शक्ल में सामने आया था। अगर पिछले 100 साल के इतिहास पर नज़र डालें, तों ब्रिटिश भारत में हिंदु मुसलिम दंगों की शुरूआत 1920 में 'खिलाफत आंदोलन' के बाद व्यापक स्तर पर फैलना इतिहास के पन्नों में दर्ज है। दरअसल, यूं कहा जा सकता है कि धार्मिक आधार पर एक लंबी लकीर खिंच चुकी थी। जिसका परिणाम 'भारत का धार्मिक आधार' पर विभाजित होकर अस्तित्व में आना था। विभाजन के वक्त भारत और पाकिस्तान अस्तित्व में आये। इन सौ सालों में अब यह तीन देश बन चुके हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के 95 वें साल पूरे होने पर नागपुर के रेशमीबाग में संघ के विजयदशमी उत्सव में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि संघ अपने इस नजरिये पर अडिग है “भारत एक हिंदू राष्ट्र” है। विजयदशमी के मौके पर अपने संबोधन में सरसंघचालक ने कहा कि राष्ट्र के वैभव और शांति के लिये काम कर रहे सभी भारतीय “हिंदू” हैं।

(आशु सक्सेना) 17 वीं लोकसभा के पहले सत्र के आखिरी दिन आज़ाद भारत में भारतीय जनसंघ द्वारा 1952 में देशवासियों से किये गये वादे को मोदी सरकार 2.0 ने कार्यभार संभालने के 90 दिनों के भीतर पूरा कर दिया। मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में संविधान के अनुच्छेद 370 के खंड 1 को छोड़कर 1947 में जम्मू-कश्मीर राज्य के साथ करार के तहत अनुच्छेद के बाकी अस्थाई सभी खंड़ों को खत्म कर दिया गया है।

मोदी सरकार ने लोकसभा में पेश प्रस्ताव में कहा है कि ‘‘भारत के संविधान के अनुच्छेद 370 के खंड 1 के साथ पठित अनुच्छेद 370 के खंड 3 द्वारा प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करते हुए राष्ट्रपति संसद की सिफारिश पर यह घोषणा करते हैं कि छह अगस्त 2019 से उक्त अनुच्छेद के सभी खंड लागू नहीं होंगे... सिवाय खंड 1 के।’’ संसद के दोनों सदनों ने अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधानों को समाप्त करने के प्रस्ताव संबंधी संकल्प को भारी बहुमत से स्वीकृति दी। इसके साथ ही 17 वीं लोकसभा के पहले अधिवेशन का सत्रावसान हुआ। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने जम्मू-कश्मीर राज्य के विभाजन संबधी विधेयक को मंजूरी मिलने के तत्काल बाद सदन की कार्यवाही को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया।

(गिरिजेश वशिष्ठ) हर बार जब कोई जघन्य अपराध होता है हर तरफ से मारो मारो की चीत्कार सुनाई देने लगती है। एक भीड़ जो मौत देकर सारी समस्याएं हल कर देना चाहती है। कठुआ के बाद यही सुना, उससे पहले निर्भया में यही सुना जब भी कोई आपराध होता है मांग उठती है। चौराहे पर लटकाकर मार दो। फांसी कम से कम सजा है। कुछ लोग तो कहते हैं कि सुनवाई कोर्ट अदालत की भी ज़रूरत नहीं है लटका दो। लेकिन कभी सोचा कि आपकी तरह कानूनविद क्यों नहीं सोचते। महिलाओं के मामलें में दुनिया भर में संघर्ष करने वाली नारी समानाधिकार कार्यकर्ता क्यों नहीं ऐसी मांग करते। जाहिर बात है आप में से ज्यादातर ये बात न तो जानते हैं और न जानना चाहते हैं।

दरअसल खून का बदला खून में सभी को हर समस्या का हल दिखाई देता है। लेकिन समस्या का हल इतना आसान नहीं है फांसी चढ़ाने से समस्या बढ़ सकती है। क्या कभी आपने सोचा कि सामाजिक जागृति के बगैर आप जितना अधिक सज़ा सख्त करते जाएंगे पीड़ित महिला की जीवन की दिक्कतें बढ़ती जाएंगी। जैसे ही किसी महिला से बलात्कार होगा। पूरा समाज और परिवेश उस महिला पर दबाव डालना शुरू कर देगा।

(आशु सक्सेना) जनतादल (यू) अध्यक्ष नीतीश कुमार ने एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ सीधा मोर्चा खोल दिया है। इस बात का स्पष्ट संकेत उस वक़्त मिल गया था, जब नीतीश ने मोदी सरकार के शपथ ग्रहण समारोह का एक तरह से बहिष्कार किया था। नीतीश ने मोदी सरकार- 2 के शपथ ग्रहण समारोह के बाद दिल्ली से पटना लौटकर सबसे पहले भाजपा के इस प्रचार पर हमला किया कि एनडीए की जीत में सिर्फ एक व्यक्ति पीएम मोदी का योग्यदान है। उन्होंने कहा कि बिहार की जीत बिहारवासियों की जीत है। इसे किसी एक व्यक्ति या पार्टी से जोड़कर नही देखा जा सकता।

नीतीश कुमार के रूख से साफ है कि एनडीए में रहते हुए 17 वीं लोकसभा में तमाम विवादास्पद मुद्दों पर उनकी पार्टी के सांसद केंद्र की 'भाजपा नीत एनडीए सरकार' के खिलाफ खड़े नज़र आ सकते हैं। इस युग के समाजवादी नेताओं में नीतीश कुमार अपनी धारा के नेताओं में अग्रणी हैं, जिन्होंने बाबरी विध्वंस के बाद सत्ता की दौड़ में सबसे पहले भाजपा से नाता जोड़ा है। 1996 में नीतीश कुमार की 'समता पार्टी' ने अटल बिहारी बाजपेई की 13 दिन की सरकार का समर्थन किया था।

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