(पुष्परंजन): पूरी पाण्डुलिपि पढ़ना, और फ़िर उसका रिव्यू लिखना, मेरे लिए पर्वतारोहण से कम नहीं था। बीच-बीच में तगादा, " क्या किया? पढ़े कि नहीं? प्रिंटिंग के लिए भेजना है..." तब कवि सुधीर सक्सेना, मुझे काबुली पठान से कमतर नहीं लगते। आप में से कुछ ने संभवतः कार्ल मार्क्स की प्रेम कवितायेँ पढ़ी होंगी। तीन वॉल्यूम में दास कैपिटल लिखा था, उसके बरक्स पांच वॉल्यूम में हैं कार्ल मार्क्स के 'लव पोयम्स'. मार्क्स ने अपनी ज़हीन- ख़ूब-रू पत्नी, "जेनी फॉन वेस्टफालन" के लिए प्रेम कवितायेँ तब लिखी थीं, जब जर्मन रोमांटिसिज़म उरूज़ पर था।
पत्नी के लिए प्रेम कविताएँ उतनी ही निजी होती हैं, जितनी कि बेडरूम की बातें। लेकिन, पत्नीत्तर कविताएँ गढ़ने का साहस कवि करे, तो पढ़ना दिलचस्पी का विषय हो जाता है। उसे परस्त्रीगमन की दृष्टि से नहीं, भावनाओं के स्थानांतरण की दृष्टि से देखिये, और समझिये। कवि ने आरम्भ में ही साफ़-गोई से अपनी बात कह दी थी, " ये कवितायेँ तुम्हें/ जिसे प्रेम किया/ और, उन्हें भी जिन्हें चाहा/ कि उनमें भी तुम्हारा ही अक्स था।" यों, हिंदी साहित्य में ऐसे अभिनव प्रयास होते रहना चाहिए।
दरअसल, प्रेमियों की परीक्षा वियोग में दरपेश होती है। संयोगावस्था में भोग के कारण प्रेम भले ही शिथिल हो जाए, मगर, वियोग में प्रेम, तपस्या में रूपांतरित हो जाता है। कालिदास के काव्यों में ऋतुसंहार को छोड़कर सर्वत्र प्रेम का उदात्त रूप चित्रित है। ऋतुसंहार में केवल रूप सौन्दर्य का निरूपण है। मेघदूतम् , रघुवंशम् और कुमारसंभवम् में कवि ने प्रेम के आध्यात्मिक स्वरुप का चित्रण किया है। लेकिन, बात-बे-बात, "फक यू" बोलने वाली आज की पीढ़ी को प्रेम की बिंदास-बेबाक अभिव्यक्ति चाहिए। अलंकरण से इस पीढ़ी को परहेज़ है। कालिदास की प्रेम कविताओं का कितना असर डॉ. सुधीर सक्सेना के शाब्दिक-श्रृंगारिक संरचना में है, इसकी पड़ताल की गुंजाइश तो बनती है। मगर, अमृतकाल के अमृतकुंभ में रचनाओं की जब होड़ लगी हो, तब इस कवि की तुलना कालिदास से करना ज़्यादती हो जाएगी। क्योंकि, डॉ. सुधीर सक्सेना सदाचार, संयम और सामाजिक मर्यादा में बँध कर जीने वाले रचनाकार नहीं लगते, उनकी कविताओं को परत-दर-परत पढ़ने पर ऐसा ही महसूस होता है।
सुधीर सक्सेना को फ़िर हम कहाँ ढूंढे? अबू ए-क़ासिम फिरदौसी तुसी में ढूंढे, उमर खैय्याम, रूमी में ढूंढे, या कि हफीज़, सादी शिराज़ी में? कवि सुधीर सक्सेना को ढूंढने का प्रयास मैंने ब्रिटिश कवियन की कुञ्ज गलियों में भी किया। रोमांटिक कवियों की पहली पीढ़ी सैमुअल कोलरिज (1772-1834), विलियम ब्लेक (1757-1827), विलियम वर्ड्सवर्थ (1770-1850) चार्ल्स लैम्ब (1775-1834), जेन ऑस्टेन (1775-1817) समेत, सर वाल्टर स्कॉट (1771-1832) की प्रेम कविता, "द लेडी ऑफ द लेक" में वो बातें-मुलाक़ातें तो नहीं मिलती। लेकिन, दूसरी पीढ़ी के प्रसिद्ध आयरिश कवि और नाटककार डब्ल्यू.बी. येट्स की कालजयी कविताओं में वो तत्व और परिस्थितियां प्रस्तुत होती दीखती हैं। येट्स और जॉर्ज मेव येट्स ने 1917 में शादी की, और 1939 में येट्स मृत्यु तक सहधर्मिणी बनी रहीं। येट्स को जॉर्ज अक्सर अपनी प्रेरणा, सहयोगी और बौद्धिक संरचनाओं में सहकार के रूप में संदर्भित करते थे। येट्स की प्रेम कविताओं में पत्नी की उपस्थिति पाम्परिक दाम्पत्य संबंधों से परे दिखता था।
रुमानियत से रु-बरु चीनी रचना संसार भी रहा है। इसके स्वर्णकाल में दो हज़ार दो सौ कवियों ने पचास हज़ार से ज़्यादा कविताएँ लिखीं। ली पाई थांग राजवंश (618-907 ई.) के सबसे महान रूमानी कवियों में से एक थे। थांग राजाओं के कालखंड को चीनी कविता का स्वर्ण युग माना जाता है। ली पाई अपनी अजर, अमर्त्य रचनाओं की वजह से "कविता के देवता" के रूप में सम्मानित हुए। चीन में सोंग डायनेस्टी (960 से 1279 ईस्वी) के समय एक यायावर कवि थे सु शी. अपनी पत्नी वांग फू को बेइंतिहा प्यार करते थे। पत्नी को समर्पित "रिवर सिटी" उनकी सुप्रसिद्ध रचना है।
सु शी ने "रिवर सिटी" 1075 के आसपास लिखी थी, जब उन्हें अपनी दिवंगत पत्नी का सपना आया था। सु शी ने वांग फू से 1054 ईस्वी में शादी की थी। उसके ग्यारह साल बाद, यानि 1065 में उनकी मृत्यु हो गई। कवि सु शी, अपनी पत्नी वांग फू के शव को अगले साल सिचुआन वापस ले आए। "रिवर सिटी" की कुछ कविताओं से आप गुज़रिये, और कवि सुधीर सक्सेना की रचनाओं में से एक, " इस तरह" को पढ़िए, लगभग वैसा ही आभास होता है- " तुम/ सुनती रही वो/ जो मैं/ कह न सका/ बहुत कुछ कहने के बाद भी/ और यूँ / तुम हुई मेरी संगिनी / मेरी प्रिया।" और इसी संग्रह में दूसरी कविता " एक दिन ", कुछ-कुछ "रिवर सिटी" जैसी कैनवास पर उकेरी- " एक दिन/ धूप में / आसमान से उतरकर/ एक चिड़िया आएगी/ और चोंच मरने लगेगी / छत पर बिखरे दानों पर/ तब मुझे / तुम्हारी याद आएगी/ तुम/ जो एक चिड़िया बनकर / एक दिन/ आसमान में उड़ गयी थीं / मुझे अकेला छोड़।"
सुधीर सक्सेना शब्दाडंबर नहीं रचते। सधे हुए शब्दों में कवि की "ख़्वाहिश" की अभिव्यक्ति आपको ‘बहुत ख़ूब’ कहने को विवश करेगी- "बारिश आती है/ यकबयक/ तो हम ढूंढते हैं / कोई सायबान/ कोई दरख़्त/ कोई ओट/ कोई छज्जा/ जब अकेले होते हैं/ कुछ भी नहीं खोजते/ जब साथ होती हो तुम / चाहते हैं बस / कि दूर-दूर तलक/ न सायबान हो/ न दरख़्त / न ओट/ न छज्जा / बस/ ग़ज़ब की बारिश हो / भींगते रहे हम/ आपादमस्तक/ एक साथ/ सदियों तक।"
डॉ. सुधीर सक्सेना यायावर हैं। प्रेम कविताओं के इस फलक को व्यापक और वैश्विक बनाते चले गए। चुनांचे, इस संकलन की चंद कविताएँ, प्रवासी पक्षी की तरह उड़ान भरती, गुटर-गूँ करती दीखती हैं। नेपाली में 'माउन्ट एवरेस्ट' को "सगरमाथा" बोलते हैं, जिसका अर्थ होता है, " स्वर्ग की चोटी." आप "सगरमाथा के देश में", जैसी रचना पढ़िए. कवि सुधीर सक्सेना, पत्नी का अक्स, जाने किस त्रिपुर सुंदरी में ढूंढते दीखेंगे, जिसे नेपाली लोक कथाओं में ऐश्वर्य, भोग और मोक्ष की अधिष्ठात्री माना जाता है। "सगरमाथा के देश में/ तुम्हीं थीं/ और तुम्हारी 'मुसु-मुसु' हांसी/ तुमने शरारतन कहा था- "माया गर्नुस।" क्या ग़ज़ब चयन है, शब्दों का। कोई नेपाली रूपवती इतना भर कह दे "माया गर्नुस" अर्थात, 'प्यार करो।' हम तो बिछ जाएँ। और कवि, अगली पंक्ति में मस्क्वा पहुँच चुके थे।
सुधीर सक्सेना की रेंज ज़बरदस्त है, जिसे हिंदी में ढूंढने की चुनौती बनी रहेगी। कवि का चंचल मन "मछलियों वाली थाई स्त्री" से लेकर जोहानिसबर्ग एयरपोर्ट पर लकी स्टोन बेच रही अश्वेत स्त्री तक पहुँच जाता है। "फाइन मेन सरेंडर टू ब्लैक" के एक टुकड़े पर मुलाहिज़ा फरमाएँ - " काली स्त्री की/ काली पुतलियों में उमगता है प्यार/ काली स्त्री के पुष्ट स्तनों में छलकता है दूध/ उतना ही धवल, उतना ही मीठा/ जितना किसी गोरी मेम का दूध।"
यह ठीक वैसे ही है, जैसे रीतिकाल के महान कवि बिहारी का नायक, नायिका के श्याम वर्ण और सहज रूप से दिखने वाले बालों पर ही रीझ गया था- "सहज सचिक्कन, स्याम रुचि, सुचि, सुगंध, सुकुमार। गनतु न मनु पथु अपथु, लखि बिथुरे सुथरे बार॥" यों, इस मनोविज्ञान को समझने की आवश्यकता है कि श्रृंगार रस के कवियों को पुष्ट स्तनों से सुशोभित, प्रशस्त नितंबिनी, श्याम वर्ण स्त्रियां क्यों भाती हैं? डॉ. सुधीर सक्सेना यदि शंका समाधान करें, तो हिंदी जगत लाभान्वित होगा।
अमेरिका की प्रसिद्ध कवयित्री और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता माया आंजेलू ने "ब्लैक इज़ ब्यूटीफुल" रचते समय कुछ ऐसा ही उकेरा था: “मेरे पार्श्व की गोलाई/ मेरी मुस्कान का सूरज/ मेरे स्तनों की सवारी/ मेरी शैली की सुघड़ता।” किसी रचना के कैनवास में कवि चाहे जितना रंग भर दे, मगर वो पंक्तियाँ अमर्त्य, अपने सुधि पाठकों की वजह से होती है, प्रोपेगंडा से नहीं।
लियोपोल्ड सेडर सेनघोर, प्रसिद्ध कवि, समाजवादी राजनीतिज्ञ और सांस्कृतिक सिद्धांतकार थे, जो सेनेगल के पहले राष्ट्रपति थे। बाद में सेनघोर, फ़्रांस में बस गए। "ब्लैक वुमन" उनकी विश्व प्रसिद्ध कविता है, जो मूल रूप से 1945 में "फेम नॉयर" टाइटिल से फ्रेंच में लिखी गई थी। कालांतर में अंग्रेजी में अनुवाद के बाद, इस कविता की प्रसिद्धि बढ़ती चली गई। "नग्न महिला/ काली महिला/ अपने रंग को धारण करो जो जीवन है/ अपने रूप को धारण करो जो सुन्दरता है।" सेनघोर ने "ब्लैक वुमन" में अफ़्रीका को एक ख़ूबसूरत महिला के रूप में उकेरा है। कविता के अंतिम छंद में अफ़्रीका की सुंदरता के विनाश का पूर्वाभास किया गया है, और कवि कल्पना करता है कि "ईर्ष्यापूर्ण भाग्य" सुंदरता को "राख में बदल देगा"।
बेशक़, सुधीर सक्सेना के शब्द पावरफुल होते हैं, लियोपोल्ड सेडर सेनघोर की तरह। लेकिन, "केशपाश" को और भी असरदार, अंतिम तीन लाइनों से ही बनाया जा सकता था- " सुरमई रात होने में अभी देर है प्रिये/ तुम कब खोलोगी अपना/ केशपाश !" डॉ. सुधीर सक्सेना ने प्रेम कविताओं के इस संकलन से "प्रेम गली अति सांकरी, जा में दो न समाय.", के नैरेटिव को विस्तार दिया है।
यह तय करना थोड़ा मुश्किल सा हो रहा हो रहा है, कि सुधीर सक्सेना ने विलक्षण शब्दों को अपनी दिवंगत पत्नी के लिए पिरोया है, या प्रेमिकाओं के लिए। लेकिन इस संकलन की बहुतेरी कविताएँ दिलचस्प हैं। यह आपको बाँधें रखती हैं। बोर नहीं करती। पत्नी के अक्स को प्रेमिकाओं में ढूँढना, दाम्पत्य जीवन में नीत्से के 'लिव डेंजरस्ली' (जोखिम के साथ जियो) जैसी परिस्थितियां पैदा करती हैं। डॉ. सुधीर सक्सेना जैसा साहसिक प्रयोग, और पारदर्शिता का प्रयास हिंदी के समकालीन कवि-लेखकों को करना चाहिए. नहीं कीजियेगा, तो इसका जोखिम बना रहेगा कि कोई बालक बुद्धि छात्र " आचार्य की रजाई " जैसी कहानी लिखकर आपको "कालजयी" न कर दे!
लेखक पुष्परंजन, जानेमाने पत्रकार है, उन्होंने डॉ. सुधीर सक्सेना की पुस्तक " बस तुम" की भूमिका भी लिखी है। प्रेसबुक पर साझा उनका लेख साभार।
फोटो: सोशल मीडिया से साभार