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ईटानगर: सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) अरुणाचल प्रदेश में 4170 मीटर ऊंचे सेला दर्रा से गुजरने वाली दो सुरंगों का निर्माण करेगा जिससे तवांग से होकर चीन की सीमा तक की दूरी 10 किलोमीटर तक कम हो जाएगी। बीआरओ की एक विज्ञप्ति में कहा गया कि 'इन सुरंगों से तेजपुर में सेना के 4 कॉर्प के मुख्यालय और तवांग के बीच यात्रा के समय में कम से कम एक घंटे की कमी आएगी। इससे बड़ी बात यह है कि इन सुरंगों से यह सुनिश्चित होगा कि एनएच 13 और खासतौर से बोमडिला व तवांग के बीच 171 किलोमीटर लंबे रास्ते में हर मौसम में आवागमन हो सके।' बताया जा रहा है कि भारी हिमपात के समय जब सड़क सपर्क टूटेगा तो ये सुरंगें भारतीय सेना के लिए वरदान साबित होंगी। सुरंगों का निर्माण पूर्वी हिमालय में राज्य के दुर्गम स्थलों से गुजरते हुए तिब्बत के अग्रिम इलाकों तक जल्द पहुंचने की भारत की कवायद का हिस्सा है। विज्ञप्ति में कहा गया है कि बीआरओ की वर्तक परियोजना के तहत 42 सीमा सड़क कार्य बल के कमांडर आरएस राव ने वेस्ट कमेंग के उपायुक्त सोनल स्वरूप से सेला सुरंग के निर्माण को भूमि का अधिग्रहण करने के लिए औपचारिक अनुरोध किया है।

तवांग (अरुणाचल प्रदेश): तिब्बत के आध्यात्मिक नेता दलाई लामा ने कहा है कि उनका उत्तराधिकारी ढूंढ़ने की चीन की कोशिश बकवास है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि यह संस्थापन अब प्रासंगिक नहीं रहा तो इसे बंद कर दिया जाना चाहिए। दलाई लामा ने यहां शनिवार को कहा, तिब्बत के उद्देश्य को कमतर करने के लिए मेरा उत्तराधिकारी नामजद करने का बीजिंग का प्रयास बकवास है। मैंने वर्ष 1969 में कहा था कि तिब्बती लोग यह तय करेंगे कि दलाईलामा के संस्थान को जारी रखा जाना चाहिए या नहीं। 82 वर्षीय आध्यात्मिक नेता ने कहा, कोई नहीं जानता कि कौन और कहां से दलाई लामा पैदा होंगे या आएंगे। मेरी मौत के समय कोई संकेत आ सकता है। लेकिन अभी ऐसा संकेत नहीं है। हालांकि उन्होंने अगले दलाई लामा के महिला होने की संभावना से इनकार नहीं किया। भाजपा नीत राजग सरकार की चीन संबंधी नीति पर दलाई लामा ने कहा, यह कमोबेश नरसिम्हा राव सरकार के दिनों की कांग्रेस की नीति जैसी ही है। लेकिन मैं नरेंद्र मोदी की प्रशंसा करता हूं। वह सक्रिय हैं एवं विकास चाहते हैं। दलाई लामा ने कहा कि वह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अमेरिका पहले नीति से असहमत हैं। यह उस देश के अनुकूल नहीं है जो स्वतंत्र सोच को प्रोत्साहित करता है। उन्होंने अमेरिका के संरक्षणवाद से दूरी बनाने के लिए यूरोपीय संघ की तारीफ की।

तवांग (अरुणाचल प्रदेश): तिब्बतियों के आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा चीन की नाराजगी को नजरअंदाज कर शुक्रवार को तवांग मठ पहुंच गए। मठ में बौद्ध भिक्षुओं तथा कई श्रद्धालुओं ने उनका बेहद गर्मजोशी के साथ स्वागत किया। शांति के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित दलाई लामा तवांग मठ में ठहरेंगे। यह मठ भारत का सबसे बड़ा और दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बौद्ध मठ है। दुनिया का सबसे बड़ा बौद्ध मठ तिब्बत का पोटला पैलेस है। प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू तिब्बती धर्मगुरु के साथ हैं। दलाई लामा सन् 1959 से ही भारत में निर्वासित जीवन जी रहे हैं। बर्फ से घिरे पहाड़ों तथा 10,000 फुट की ऊंचाई पर स्थित तवांग में मोनपा लोग रहते हैं, जो तिब्बती बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं। दलाई लामा के दौरे के मद्देनजर पूरे तवांग को भारत तथा तिब्बत के झंडों तथा फूलों के अलावा, रंगीन प्रार्थना झंडों से सजाया गया। सड़कों को रंगा गया और नालों की सफाई की गई। एक सरकारी अधिकारी ने कहा, "सैकड़ों की तादाद में लोग पारंपरिक औपचारिक स्कार्फ लिए हुए सड़क पर अगरबत्तियां जलाकर दलाई लामा के दर्शन तथा उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए कतार में खड़े थे।" दलाई लामा की एक झलक पाने के लिए लद्दाख तथा पड़ोसी देश भूटान से हजारों की तादाद में लोग तवांग पहुंच चुके हैं। मठ के सचिव लोबसांग खुम ने कहा, "हम दलाई लामा की यात्रा की तैयारी पिछले दो महीने से कर रहे हैं। हर कोई उनकी एक झलक पाना, उनसे बातें करना और उनका आशीर्वाद लेना चाहता है।

बोम्डिला (अरुणाचल प्रदेश): अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने गुरुवार को कहा कि चीन को भारत को यह कहने का हक नहीं है कि वह देश में दलाई लामा की गतिविधि को लेकर क्या करे, क्या ना करे। उन्होंने संवाददाताओं से कहा, ‘‘चीन को हमें यह बताने का कोई हक नहीं है कि हम (दलाई लामा की गतिविधि को लेकर) क्या करें क्या ना करें। वह हमारा सीधा सीधा पड़ोसी नहीं है। भारत की सीमा तिब्बत से लगी है, चीन से नहीं।’’ मुख्यमंत्री ने कहा, ‘‘वास्तविकता में मैकमोहन रेखा भारत और तिब्बत की सीमा निर्धारित करती है।’’ वह बुधवार को गुवाहाटी से बोम्डिला की आठ घंटे की यात्रा के दौरान दलाई लामा के साथ थे। उन्होंने कहा कि यह कठिन यात्रा करना तिब्बती अध्यात्मिक गुरु की ओर से एक साहसी फैसला था। वाशिंगटन पोस्‍ट ने लिखा, 'भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्ता संभालने के बाद से ही चीन की तरफ लगातार आक्रामक रुख अपना रखा है। उसी वर्ष उन्‍होंने अपने शपथ ग्रहण समारोह में तिब्‍बत के निर्वासित प्रधानमंत्री को भी आमंत्रित किया था। लेकिन केवल मोदी ही नहीं हैं जो उकसाने वाली बातें कर रहे हैं। अरुणाचल प्रदेश के मुख्‍यमंत्री ने दलाई लामा के दौरे को लेकर एक कदम और आगे जाने का फैसला किया। उनके बयान कि 'उनके राज्‍य की सीमा चीन से नहीं बल्कि तिब्‍बत से लगती है' का हवाला देते हुए अखबार लिखता है, 'इसकी बीजिंग में जबरदस्‍त प्रतिक्रिया होनी चाहिए।'

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