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(अरुण दीक्षित) हालांकि उनके अपने ही उन्हें "अस्थिर चित्त" बता चुके हैं! उनका मजाक भी बहुत उड़ाया गया है। कोई उनकी बात को गंभीरता से नहीं लेता है। लेकिन वे पिछले कुछ समय से बहुत ही गंभीर मुद्दे उठा रही हैं। पहले उन्होंने समाज के लिए सबसे घातक साबित हो रही शराब का मुद्दा उठाया था। अब वे शिक्षा और स्वास्थ्य की बात कर रही हैं। उन्हें लगता है कि इस सरकार के जो चार महीने बचे हैं उनमें बहुत कुछ किया जा सकता है। लेकिन सबसे अहम सवाल यह है कि उनकी सुनेगा कौन?
आप ठीक समझे हैं..मैं मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती की ही बात कर रहा हूं। वही उमा भारती जो 2003 में प्रचंड बहुमत से बीजेपी को प्रदेश में सत्ता में लाईं थीं। और 9 महीने में ही उन्हें कुर्सी छोड़नी पड़ी थी। उसके बाद से अब तक वे राजनीति के वियाबान में भटक रही हैं। हालांकि उन्हें मोदी सरकार में जगह मिली थी। लेकिन वे कुछ खास नहीं कर पाईं। करीब 4 साल से वे बिल्कुल खाली हैं।
उमा भारती ने दो साल पहले प्रदेश में शराबबंदी का मुद्दा उठाया था।इसके लिए उन्होंने धरना दिया। प्रदर्शन किया। शराब की दुकान पर पत्थर भी फेंके!
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(धर्मपाल धनखड़) राहुल गांधी बीजेपी के गले में फांस बनकर अटक गया है। जिसे ना उगलते बन रहा है ना निगलते। प्रधानमंत्री मोदी के अमरीका दौरे से ठीक पहले, वहां पहुंच कर रोज सरकार और प्रधानमंत्री पर ताबड़तोड़ हमले बोल रहा है। अभी बीजेपी का थिंक टैंक राहुल के हमलों की काट ढूंढ ही रहा था कि ट्विटर के को-फाउंडर और पूर्व सीईओ जैक डोर्सी ने एक यू-ट्यूब चैनल को इंटरव्यू देकर नया बखेड़ा खड़ा कर दिया।
डोर्सी ने इंटरव्यू में दावा कि किसान आंदोलन के दौरान भारत सरकार ने ट्विटर को उसके कर्मचारियों पर छापा मारने और ऑफिस को बंद करने की धमकी दी थी।
उन्होंने ये भी आरोप लगाया कि सरकार ने कुछ लोगों के अकाउंट बंद करने का दबाव बनाया था। पूर्व सीईओ डोर्सी को भी अब ही मौका मिला था मुंह खोलने का। इतने दिनों तक क्यों चुप्पी साधे बैठा रहा? बोलना ही था, तो तब बोलता, जब किसान नेता, उनके ट्विटर अकाउंट बंद करने के आरोप सरकार पर लगा रहे थे। तब हिम्मत नहीं हुई! अब नौकरी खत्म होने के बाद बोलने का क्या औचित्य?
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(अरुण दीक्षित) राजधानी भोपाल में सरकार के प्रमुख प्रशासनिक भवन में 12 जून को लगी आग तो करीब दस घंटे बाद बुझ गई लेकिन इस आग ने ऐसे कई सवाल खड़े कर दिए हैं जिनके जवाब सब चाहेंगे? पर उनके मिलने की उम्मीद बेमानी होगी।इस आग ने सरकार और उसके मुखिया दोनों को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। पर उसकी परवाह कौन करता है।
सोमवार दोपहर साढ़े तीन बजे जिस इमारत में आग लगी वह मंत्रालय से मात्र 40 मीटर की दूरी पर है। मुख्यमंत्री और मुख्यसचिव के आलीशान दफ्तर से सतपुड़ा नाम की इस इमारत को बड़ी बारीकी से देखा जा सकता है। इसमें कई महत्वपूर्ण विभागों के दफ्तर हैं। हजारों कर्मचारी इसमें रोज आते जाते हैं।
मजे की बात यह है कि सतपुड़ा से फायर ब्रिगेड मुख्यालय भी कुछ मीटर की दूरी पर ही है।फायर ब्रिगेड का स्थानीय फायर स्टेशन भी ज्यादा दूर नहीं है। इसके बाद भी आग बुझाने में 10 घंटे से ज्यादा का समय लग गया। दशकों पुराना भवन करीब 80 प्रतिशत खाक हो गया है।
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(धर्मपाल धनखड़): हरियाणा में बीजेपी-जेजेपी गठबंधन के नेताओं की एक दूसरे के खिलाफ बयानबाजी बदस्तूर जारी है। पूर्व केंद्रीय मंत्री बीरेंद्र सिंह ने दावा किया है कि यदि पार्टी कहे तो वे जेजेपी के सात विधायक लाकर दे सकते हैं। इस पर पूर्व सांसद अजय सिंह चौटाला ने चुनौती दी है कि वे जेजेपी का एक विधायक तो तोड़कर भाजपा में शामिल करवाकर तो दिखायें। माना जा रहा था कि मुख्यमंत्री मनोहरलाल के गठबंधन को लेकर दो दिन पहले दिये स्पष्टीकरण के बाद एक दूसरे की छीछालेदर करने वाली बयानबाजी का दौर थम जायेगा। लेकिन ऐसा हुआ नही।
मुख्यमंत्री ने कहा था कि गठबंधन सरकार सफलतापूर्वक काम कर रही हैं। चुनाव में किसी को भी स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने पर प्रदेश हित में गठबंधन किया गया था और यह जारी रहेगा। वहीं उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला ने गठबंधन को लेकर उठे विवाद का ठीकरा मीडिया पर फोड़ा। चौटाला ने कहा कि वो गठबंधन को मजबूत कर रहे हैं, लेकिन मीडिया लंबे समय से गठबंधन को तुड़वाने में लगा है।
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