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(धर्मपाल धनखड़) इन दिनों हरियाणा में 2024 में होने वाले लोकसभा और विधानसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक दल माहौल गर्माने में लगे हैं। वास्तव में देखा जाये तो बीजेपी और कांग्रेस को छोड़कर, बाकी पार्टियां लोकसभा चुनाव को ज्यादा महत्व नहीं दे रही हैं। उनका एकमात्र लक्ष्य विधानसभा चुनाव जीतकर सत्ता पर काबिज होना है। तमाम पार्टियों और उनके प्रमुखों की जंग मुख्यमंत्री बनने को लेकर है।
सबसे पहले प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस की बात करते हैं। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा और हाथ से हाथ जोड़ों अभियान के बाद इन दिनों कांग्रेस 'विपक्ष आपके समक्ष' कार्यक्रम चला रही हैं। बेशक गुटबाजी की शिकार कांग्रेस पिछले नौ साल में धरातल पर संगठन भी नहीं खड़ा कर पायी है। लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और उनके सांसद पुत्र दीपेंद्र हुड्डा पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष उदयभान को लेकर ताबड़तोड़ जनसभाएं कर रहे हैं। और उन्हें जनता का समर्थन भी मिला रहा है। वहीं कांग्रेस के अलग-अलग गुटों के नेताओं के बीच भी मुख्यमंत्री बनने की जंग तेज होती दिख रही है।
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(अरुण दीक्षित) हालांकि उनके अपने ही उन्हें "अस्थिर चित्त" बता चुके हैं! उनका मजाक भी बहुत उड़ाया गया है। कोई उनकी बात को गंभीरता से नहीं लेता है। लेकिन वे पिछले कुछ समय से बहुत ही गंभीर मुद्दे उठा रही हैं। पहले उन्होंने समाज के लिए सबसे घातक साबित हो रही शराब का मुद्दा उठाया था। अब वे शिक्षा और स्वास्थ्य की बात कर रही हैं। उन्हें लगता है कि इस सरकार के जो चार महीने बचे हैं उनमें बहुत कुछ किया जा सकता है। लेकिन सबसे अहम सवाल यह है कि उनकी सुनेगा कौन?
आप ठीक समझे हैं..मैं मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती की ही बात कर रहा हूं। वही उमा भारती जो 2003 में प्रचंड बहुमत से बीजेपी को प्रदेश में सत्ता में लाईं थीं। और 9 महीने में ही उन्हें कुर्सी छोड़नी पड़ी थी। उसके बाद से अब तक वे राजनीति के वियाबान में भटक रही हैं। हालांकि उन्हें मोदी सरकार में जगह मिली थी। लेकिन वे कुछ खास नहीं कर पाईं। करीब 4 साल से वे बिल्कुल खाली हैं।
उमा भारती ने दो साल पहले प्रदेश में शराबबंदी का मुद्दा उठाया था।इसके लिए उन्होंने धरना दिया। प्रदर्शन किया। शराब की दुकान पर पत्थर भी फेंके!
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(धर्मपाल धनखड़) राहुल गांधी बीजेपी के गले में फांस बनकर अटक गया है। जिसे ना उगलते बन रहा है ना निगलते। प्रधानमंत्री मोदी के अमरीका दौरे से ठीक पहले, वहां पहुंच कर रोज सरकार और प्रधानमंत्री पर ताबड़तोड़ हमले बोल रहा है। अभी बीजेपी का थिंक टैंक राहुल के हमलों की काट ढूंढ ही रहा था कि ट्विटर के को-फाउंडर और पूर्व सीईओ जैक डोर्सी ने एक यू-ट्यूब चैनल को इंटरव्यू देकर नया बखेड़ा खड़ा कर दिया।
डोर्सी ने इंटरव्यू में दावा कि किसान आंदोलन के दौरान भारत सरकार ने ट्विटर को उसके कर्मचारियों पर छापा मारने और ऑफिस को बंद करने की धमकी दी थी।
उन्होंने ये भी आरोप लगाया कि सरकार ने कुछ लोगों के अकाउंट बंद करने का दबाव बनाया था। पूर्व सीईओ डोर्सी को भी अब ही मौका मिला था मुंह खोलने का। इतने दिनों तक क्यों चुप्पी साधे बैठा रहा? बोलना ही था, तो तब बोलता, जब किसान नेता, उनके ट्विटर अकाउंट बंद करने के आरोप सरकार पर लगा रहे थे। तब हिम्मत नहीं हुई! अब नौकरी खत्म होने के बाद बोलने का क्या औचित्य?
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(अरुण दीक्षित) राजधानी भोपाल में सरकार के प्रमुख प्रशासनिक भवन में 12 जून को लगी आग तो करीब दस घंटे बाद बुझ गई लेकिन इस आग ने ऐसे कई सवाल खड़े कर दिए हैं जिनके जवाब सब चाहेंगे? पर उनके मिलने की उम्मीद बेमानी होगी।इस आग ने सरकार और उसके मुखिया दोनों को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। पर उसकी परवाह कौन करता है।
सोमवार दोपहर साढ़े तीन बजे जिस इमारत में आग लगी वह मंत्रालय से मात्र 40 मीटर की दूरी पर है। मुख्यमंत्री और मुख्यसचिव के आलीशान दफ्तर से सतपुड़ा नाम की इस इमारत को बड़ी बारीकी से देखा जा सकता है। इसमें कई महत्वपूर्ण विभागों के दफ्तर हैं। हजारों कर्मचारी इसमें रोज आते जाते हैं।
मजे की बात यह है कि सतपुड़ा से फायर ब्रिगेड मुख्यालय भी कुछ मीटर की दूरी पर ही है।फायर ब्रिगेड का स्थानीय फायर स्टेशन भी ज्यादा दूर नहीं है। इसके बाद भी आग बुझाने में 10 घंटे से ज्यादा का समय लग गया। दशकों पुराना भवन करीब 80 प्रतिशत खाक हो गया है।
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