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(आशु सक्सेना) 17 वीं लोकसभा के पहले सत्र के आखिरी दिन आज़ाद भारत में भारतीय जनसंघ द्वारा 1952 में देशवासियों से किये गये वादे को मोदी सरकार 2.0 ने कार्यभार संभालने के 90 दिनों के भीतर पूरा कर दिया। मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में संविधान के अनुच्छेद 370 के खंड 1 को छोड़कर 1947 में जम्मू-कश्मीर राज्य के साथ करार के तहत अनुच्छेद के बाकी अस्थाई सभी खंड़ों को खत्म कर दिया गया है।

मोदी सरकार ने लोकसभा में पेश प्रस्ताव में कहा है कि ‘‘भारत के संविधान के अनुच्छेद 370 के खंड 1 के साथ पठित अनुच्छेद 370 के खंड 3 द्वारा प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करते हुए राष्ट्रपति संसद की सिफारिश पर यह घोषणा करते हैं कि छह अगस्त 2019 से उक्त अनुच्छेद के सभी खंड लागू नहीं होंगे... सिवाय खंड 1 के।’’ संसद के दोनों सदनों ने अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधानों को समाप्त करने के प्रस्ताव संबंधी संकल्प को भारी बहुमत से स्वीकृति दी। इसके साथ ही 17 वीं लोकसभा के पहले अधिवेशन का सत्रावसान हुआ। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने जम्मू-कश्मीर राज्य के विभाजन संबधी विधेयक को मंजूरी मिलने के तत्काल बाद सदन की कार्यवाही को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया।

 

अपने इस फैसले को मोदी सरकार आज़ाद भारत के इतिहास में सबसे बड़ा फैसला बता रही है। आज़ाद भारत की परिकल्पना अगर आरएसएस के नज़रिए से करें, तो निसंदेह यह देश के लिए सबसे बड़ा फैसला माना जाएगा। लेकिन अगर इतिहास के झरोखे में देखें, तो तमाम विपरित हालातों में 27 अक्टूबर 1947 को जम्मू-कश्मीर राज्य को भारत का अखंड हिस्सा बनाने वालों का फैसला ज्यादा तार्किक और बड़ा फैसला था। जिसके चलते आज़ादी के 70 साल बाद अनुच्छेद 370 के सभी अस्थाई खंड़ों को निरस्त करने में मोदी सरकार सफल हो सकी है।

मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर राज्य को विभाजित करके दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया है। जम्मू-कश्मीर को विधानसभा वाले राज्य का दर्जा दिया गया है। जबकि लद्दाख को बिना विधानसभा वाले केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया है। निसंदेह सरकार का यह साहसी कदम है।

जम्मू-कश्मीर के पूर्व 'सद्र-ए-रियासत कर्णसिंह ने एक बयान में कहा, ''मुझे यह स्वीकार करना होगा कि संसद में तेजी से लिए गए निर्णयों से हम सभी हैरान रह गए। ऐसा लगता है कि इस बहुत बड़े कदम को जम्मू और लद्दाख सहित पूरे देश में भरपूर समर्थन मिला है। मैंने इस हालात को लेकर बहुत सोच-विचार किया है। उन्होंने कहा, 'निजी तौर पर मैं इस घटनाक्रम की पूरी तरह निंदा किए जाने से सहमत नहीं हूं। इसमें कई सकारात्मक बिंदु हैं। लद्दाख को केंद्रशासित प्रदेश बनाने का निर्णय स्वागत योग्य है। दरअसल, सद्र-ए-रियासत रहते हुए मैंने 1965 में इसका सुझाव दिया था।'

इतिहास पर निगाह डालें तो उसके बाद भारत ने पाकिस्तान के साथ दो लडाई लड़ी हैं। 1971 में पाकिस्तान के दो टुकड़े करवाने के बाद 1999 में इस क्षेत्र में कारगिल युद्ध के बाद जम्मू-कश्मीर पर फैसला करने की पुख्ता ज़मीन तैयार हो गई थी। संविधान रचेताओं ने अनुच्छेद 370 के खंड़ एक को छोड़कर बाकी सभी खंड़ों को अस्थाई करार दिया गया है। संविधान निर्माताओं ने यह परिकल्पना की थी कि फिलहाल राज्य को विशेष राज्य का दर्जा देकर साथ रखा जाए। बाद में अनुच्छेद 370 के खंड एक को छोड़कर बाकी सभी खंड़ों को राज्य की सहमति के आधार पर समाप्त किये जाने का प्रावधान किया गया था।

27 अक्टुबर 1947 भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर के 'सद्र-ए-रियासत' के साथ यह करार किया कि रक्षा, संचार, मुद्रा भारत सरकार की होगी। बाकी मामलों में राज्य का संविधान लागू होगा। संविधान के निर्माताओं ने जम्मू-कश्मीर के 'सद्र-ए-रियासत' के साथ हुए करार की रोशनी में इस सूबे को भारत का अखंड हिस्सा मानते हुए अस्थाई प्रावधान किये थे।

दरअसल, आरएसएस ने आज़ाद भारत में संविधान में किये गये इन अस्थाई प्रावधानों को खत्म करने को चुनावी मुद्दा बनाया था। उस चुनाव में भारतीय जनसंघ को तीन सीट पर कामयाबी मिली थी। 2019 में 303 सीट हासिल करने के बाद भाजपा ने पहले चुनाव में किये अपने वादे को पूरा किया है।

ब्रिटिश भारत में 1925 में जन्में आरएसएस के सामने सबसे बड़ा सवाल अब खड़ा हुआ है। 2019 में राष्ट्रवाद से आरएसएस ने शानदार बहुमत से देश की सत्ता हासिल कर ली है। अब उसे अपने हिंदुराष्ट्र के संकल्प को लागू करने की चुनौती है। इसके लिए उसे समाज खासकर हिंदु समाज में समरसता लानी होगी। हिंदुराष्ट्र की परिकल्पना को साकार करने के लिए हिंदु-मुसलिम एकता नही, हिंदुओं में एकता का सवाल है। आपको याद दिला दूं कि जब ब्रिटिश भारत में भारतीय कानून बनने की प्रक्रिया शुरू हुई थी, उस वक्त सबसे बड़ा विवाद हिंदुओं के बीच से उठा था।

1935 में बने भारत सरकार कानून में ​दलितों को अलग से सीटें आवंटित करने का प्रावधान किया गया। जो भारत के लोकतंत्र में आज भी लागू है। आज भी हिंदुओं में जातिगत भेदभाव ज्यादा देखने को मिल रहा है। देश के वर्तमान सामाजिक तानेबाने में मोदी सरकार ने कश्मीर को राष्ट्रवाद का मुद्दा बनाकर 2024 के लोकसभा में एक बार फिर कब्जे का संकेत दे दिया है।

बहरहाल, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) भले ही 15 अगस्त 1947 तक भारत की आज़ादी के पक्ष में नहीं था। लेकिन आज़ाद भारत के पहले चुनाव से पहले संघ ने अपनी राजनीतिक शाखा 'भारतीय जनसंघ' का गठन कर लिया था। 1952 के पहले लोकसभा चुनाव में भारतीय जनसंघ ने हिंदुत्व के नारे पर अपनी किस्मत आजमाई थी। उस चुनाव में संघ की राजनीतिक शाखा भारतीय जनसंघ को तीन सीट हासिल हुई थी। संघ की राजनीतिक शाखा का सफर तीन से शुरू होकर अब 72 साल बाद 2019 में 303 सीट पर परचम लहराने की यात्रा तक पहुंच चुका है। इसे भारतीय लोकतंत्र की खुबसूरती ही कहा जाएगा कि अंग्रेजों से देश की आज़ादी की खुली मुखालफत करने वाले संगठन की राजनीतिक शाखा भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार आज भारत की आज़ादी की 75 वीं सालगिरह की तैयारियों में जुटी हुई है।

दरअसल, संघ ने अपने 100 पूरे होने से पहले अपनी राजनीतिक शाखा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को 2019 लोकसभा चुनाव का सेमी फाइनल जीता कर संसदीय लोकतंत्र के फाइनल चुनावी मुकाबले में धमाकेदार प्रवेश किया है। 2022 में भारत की आज़ादी के तो 75 साल होंगे। जबकि 2024 में आरएसएस की स्थापना का 100 वां साल चल रहा होगा। लिहाजा 2024 का चुनाव संघ के लिए बीते लोकसभा चुनाव से ज्यादा महत्वपूर्ण होगा।

भाजपा ने लगातार दूसरी बार अपने बूते पर तीन सौ का आंकड़ा पार करके संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में निश्चित ही मतबूत दावेदारी की है। देश ने पीएम मोदी को वह सब शक्तियां दे दी हैं, जिनकी पिछले चुनाव में वह जनता से मांग कर रहे थे। पीएम मोदी ने लोकसभा चुनाव में मजबूत और मजबूर सरकार के मुद्दे को प्रमुखता से रखा और चुनाव नतीजों से साफ है कि जनता ने पीएम मोदी में भरौसा जताया है। लिहाजा मोदी सरकार 2 को फाइनल चुनावी मुकाबले में उतरने से पहले खुद को साबित करना होगा। दरअसल, देश के उस आखिरी आदमी को संतुष्ट करना होगा, जो भीड़ में सबसे पीछे खड़ा है।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना 27 सितंबर 1925 को नागपुर में हुई थी। 2025 में इस हिंदूवादी संगठन के 100 साल पूरे होने का जश्न मनाया जाएगा। उस दिशा में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पक्ष में 2019 लोकसभा चुनाव के ऐतिहासिक जनादेश को सेमी फाइनल में उनकी शानदार जीत कहा जा सकता है।

बहरहाल, आपको याद दिला दूं कि 1940 में जब ब्रिटिश गुलामी से मुक्ति यानि आज़ादी का आंदोलन अपने चरम पर था। तब आरएसएस प्रमुख एम.एस. गोलवरकर ने स्वतंत्रता आंदोलन से अलगाव को और मजबूती से जारी रखते हुए अंग्रेजों से लड़कर नहीं बल्कि "धर्म और संस्कृति की रक्षा" के माध्यम से स्वतंत्रता हासिल करने का संकल्प लिया था। इतना ही नही गोलवलकर ने ब्रिटिश-विरोधी राष्ट्रवाद की कड़े शब्दों में आलोचना करते हुए इसे "प्रतिक्रियावादी दृष्टिकोण" करार दिया था।

इतिहास के झरोखे में झांके तो भारत में हिंदू और मुसलिमों के रिश्तों में दरार की शुरूआत 1920 में 'खिलाफत आंदोलन' से मानी जाती है। जिसका नेतृत्व ब्रिटिश भारत के मुसलमानों ने किया था। खिलाफत आंदोलन द्वारा मुस्लिम जनता को लामबंद किया गया और तुर्की में ख़लीफ़ा की बहाली की मांग की गई। गांधी ने हिंदू-मुस्लिम एकता बनाए रखने के लिए इसका समर्थन किया। ताकि 'असहयोग आंदोलन' को तेज किया जाए। लेकिन हिंसा बढते देख गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। उसके बाद भड़की हिंसा हिंदू मुसलिम दंगों में तब्दील हो गई बताई जाती है। तभी एक मराठा ब्राम्हण ने हिंदू अस्मिता का झंडा बुलंद किया। मुसलमानों के खिलाफ हिंदुओं की एकजुटता का चिराग जलाया था। जो नागपुर में आज भी मशाल बनकर जल रहा है।

इतिहास साक्षी है कि ब्रिटिश भारत में आरएसएस की स्वतंत्रता आंदोलन में कोई भूमिका नही थी। आज़ाद भारत में आरएसएस ने देश के विकास को प्राथमिकता न देकर उन मुद्दों को प्राथमिकता दी, जो इस लोकतांत्रिक देश में धार्मिक टकराव को बल दे रहे थे। सैंकड़ों साल अंग्रेजों की ग़ुलामी के बाद देश 1947 में आज़ाद हुआ था। देश के विकास के लिए तमाम मुद्दे थे। उस वक्त आज के सत्ताधारियों की प्राथमिकता हिंदू-मुस्लिम था। पहले तीन लोकसभा चुनाव तक देश में प्रमुख विपक्ष वामपंथ रहा और विपक्ष की सकारात्मक भूमिका का ही परिणाम कहा जा सकता है कि 1965 की लड़ाई में हम एक सक्षम और ताकतवर देश बन चुके थे।

आज़ाद भारत के इतिहास पर ऩजर डालें, तो आरएसएस ने हमेशा टकराव का रास्ता अख्तियार किया। 90 के दशक में आरएसएस ने मंदिर मुद्दा बनाया। जिससे देश में धार्मिक उन्माद भड़के और दंगे हूुए। दंगे विकास को अवरूद्ध करते हैं, इसमें किसी वाद विवाद की ज़रूरत नही है।

बहरहाल, मोदी सरकार पूर्ण बहुमत वाली मजबूत सरकार है। देश के विकास के लिए हर गरीब को खुशहाल बनाने का ख्याब दिखाया गया है। आज़ादी के 75 वें साल में एक भी गरीब बिना छत के नही होगा। जो काम कांग्रेस और अन्य सरकारें 70 साल में नही कर पाईं, वह मोदी सरकार आठ साल में कर दिखाएगी। फिर आप 2024 में ऐसी लोकप्रिय सरकार की वापसी को कैसे रोक सकेंगे। यह बात दीगर है कि मोदी सरकार ने अच्छे दिन के वादे के तहत अपने पहले कार्यकाल में उन महत्वपूर्ण कामों पर मोहर लगाई है, जिनका वह जिम्मेदार विपक्ष के रहते विरोध कर रहे थे। मसलन, जीएसटी और आधार को उस दिशा में सबसे बड़े फैसले कहा जा सकता है।

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