देहरादून: उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने आज राज्य विधानसभा में 10 मई को शक्ति परीक्षण कराने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का स्वागत करते हुए कहा कि इससे लोकतंत्र में विधायिका की श्रेष्ठता एक बार फिर साबित हो गयी है। सर्वोच्च न्यायालय का इस संबंध में फैसला आने के तुरंत बाद संवाददाताओं से बातचीत में रावत ने यह उम्मीद भी जाहिर की कि इससे राज्य में चल रही राजनीतिक अनिश्चितता भी समाप्त हो जाएगी। रावत ने कहा, ‘इस आदेश से विधायिका की श्रेष्ठता एक बार फिर साबित हो गयी है। इस आदेश से विधानसभा में अध्यक्ष की सर्वोच्चता भी साबित हो गयी है। हम सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का सम्मान करते हें जिसने न्यायपालिका में हमारे विश्वास को और मजबूत किया है।’ सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से प्रदेश में चल रही राजनीतिक अनिश्चितता के समाप्त होने में मदद मिलने की उम्मीद जाहिर करते हुए रावत ने कहा कि इसका एकमात्र समाधान शक्ति परीक्षण ही है। उन्होंने कहा, ‘शक्ति परीक्षण का परिणाम लंबे समय से उत्तराखंड के राजनीतिक क्षितिज पर मंडरा रहे अनिश्चितता के बादल छंट जाएंगे।’ बिना नाम लिये भाजपा नेताओं पर तंज कसते हुए पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि शक्ति परीक्षण का परिणाम गिद्वों की तरह उत्तराखंड के आकाश पर मंडरा रहे लोगों को भी यहां से भगा देगा।
उन्होंने कहा, ‘उत्तराखंड के आकाश पर लंबे समय से ऐसे विधायक खाऊ गिद्ध मंडरा रहे हैं जिनका राज्य से कोई लेना देना भी नहीं है लेकिन वे झपट्टा-मार स्टाइल में विधायकों को खाने का प्रयास कर रहे हैं।’ यह पूछे जाने पर कि क्या वह विधानसभा में शक्ति परीक्षण के लिये तैयार हैं, रावत ने कहा कि वह इसके लिये हमेशा तैयार हैं। उन्होंने कहा, ‘उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने जब शक्ति परीक्षण का आदेश दिया था, तब भी हम उसके लिये तैयार थे और अब भी हम इसके लिये तैयार हैं।’ संख्या बल के अपने पक्ष में होने का दावा करते हुए रावत ने कहा कि शक्ति परीक्षण के दौरान विधायकों को उत्तराखंड के सम्मान के लिये मतदान करना होगा। उन्होंने कहा, ‘भाजपा ने उत्तराखंड के सम्मान के साथ खिलवाड़ किया। पहले उन्होंने दल-बदल कराया, फिर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू किया, उसके बाद विधायकों को खरीदने का प्रयास किया और फिर सीबीआइ को मेरे पीछे लगा दिया। विधायकों को राज्य का सम्मान बचाने के लिये मतदान करना होगा।’ पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा, ‘भाजपा द्वारा हर संभव प्रयत्न करने के बावजूद हमारे पास अपने सभी विधायकों का समर्थन है।’ कांग्रेस के अयोग्य घोषित हो चुके नौ विधायकों को राज्य विधानसभा में 10 मई को होने वाले शक्ति परीक्षण के दौरान मतदान से वंचित रखे जाने के न्यायालय के आदेश से सदन में कांग्रेस लाभ की स्थिति में नजर आ रही है। नौ विधायकों के अयोग्य घोषित होने से 71 विधायकों की क्षमता वाली विधानसभा की प्रभावी सदस्य संख्या 62 रह गयी है जिसमें बहुमत साबित करने के लिये 31 विधायकों का समर्थन जरूरी होगा। निलंबित उत्तराखंड विधानसभा के अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल ने इस संबंध में संपर्क किये जाने पर बताया कि 62 सदस्यों की प्रभावी क्षमता वाले सदन में अध्यक्ष को छोडकर अन्य सभी 61 विधायक मतदान में हिस्सा लेंगे और बहुमत का आंकड़ा हासिल करने के लिये 31 विधायकों का समर्थन जरूरी होगा। उन्होंने बताया कि मतदान में सदन में एंग्लो-इंडियन समुदाय से मनोनीत किये गये विधायक आर.वी. गार्डनर भी भाग लेंगे। विधानसभा में कांग्रेस की संख्या 27 है, जबकि भाजपा के पास 28 विधायक हैं। हालांकि उनके घनसाली से विधायक भीमलाल आर्य की पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत से नजदीकी को देखते हुए भाजपा के प्रति उनकी निष्ठा फिलहाल संदिग्ध मानी जा रही है। कांग्रेस के पास अपने 27 विधायकों के अलावा छह सदस्यीय प्रगतिशील लोकतांत्रिक मोर्चा (पीडीएफ) तथा एक मनोनीत विधायक का भी समर्थन है जिसके बल पर उसके सदन में आसानी से बहुमत के 31 के जादुई आंकड़े को पार करने की संभावना है।