नैनीताल: उत्तराखंड में पिछले माह विवादित परिस्थतियों में लगाए गए राष्ट्रपति शासन को चुनौती देने वाली पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा है कि राज्यपाल 'केंद्र सरकार का एजेंट नहीं' होता है। उत्तराखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस केएम जोसेफ ने कहा, 'आपातकालीन शक्तियों का इस्तेमाल असाधारण मामलों में ही किया जाना चाहिए।' उन्होंने कहा कि राज्य के मामलों में दखल को हल्के में नहीं लिया जा सकता। उन्होंने कहा, 'क्या आप लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार को नाटकीय ढंग से पांचवें वर्ष में गिरा सकते हैं? राज्यपाल ही ऐसे मामलों में फैसले लेता है। वह केंद्र का एजेंट नहीं है। उसने ऐसे मामले में फैसला लेते हुए शक्ति प्रदर्शन के लिए कहा है। पीठ ने कहा कि यह (जब विनियोग विधेयक को विधानसभा में पेश किया गया था तो मत विभाजन की मांग) सिर्फ इकलौता उदाहरण था और ‘यह हमारे दिमाग को परेशान कर रहा है। क्या एक मौके की वजह से लोकतांत्रिक तरीके से निर्वाचित सरकार को उसके चौथे-पांचवें वर्ष में गिराया जा सकता है। मामले की जड़ यह है कि आप लोकतंत्र की जड़ को काट रहे हैं।’ अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने दावा किया कि जब धन विधेयक को पेश किया गया तो मत विभाजन की 35 विधायकों की मांग को अनुमति नहीं देने का विधानसभा अध्यक्ष का फैसला लोकतंत्र को तबाह करने जैसा था क्योंकि 35 बहुमत का नजरिया है।
उन्होंने आरोप लगाया कि पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और विधानसभा अध्यक्ष मिले हुए थे और मत विभाजन की मांग को विफल कर दिया। उन्होंने दावा किया कि चूंकि मत विभाजन नहीं हुआ इसलिए धन विधेयक विफल हुआ और यह 18 मार्च को राज्य सरकार का गिर जाना का मामला हुआ। गौरतलब है कि इस माह की शुरुआत में कोर्ट ने केंद्र सरकार की उस दलील को खारिज कर दिया था कि सुनवाई को स्थगित कर दिया जाए। गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने हरीश रावत के शक्ति परीक्षण के एक दिन पहले, 27 मार्च को ही उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगा दिया था। अपने इस फैसले को लेकर सरकार ने एक हलफानामा दायर करते हुए दलील दी थी कि राज्य में संवैधानिक व्यवस्था पूरी तरह ठप हो गई थी।