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(धर्मपाल धनखड़) बसपा सुप्रीमो मायावती राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा विरोधी दलों में कांग्रेस के संग खड़ी दिखाई देती है, वहीं विभिन्न राज्यों में अलग-अलग क्षेत्रीय दलों के साथ प्रेम की पींग बढ़ा रही है। अर्थात तीसरा मोर्चा में शामिल रहे घटक दलों से मेल जोल बढ़ा रही हैं। यमुना के उस पार यूपी में मायावती समाजवादी पार्टी यानी अखिलेश और राष्ट्रीय जनता दल के साथ खड़ी दिखाई देती हैं। वहीं यमुना के इस पार हरियाणा में वह इंडियन नेशनल लोकदल के साथ गठबंधन कर चुकी हैं। एक तरह से देखा जाए तो यमुना के उस पार वह चौधरी चरण सिंह की विरासत को बसपा के साथ जोड़ने की कोशिश कर रही हैं, तो यमुना के इस पार चौधरी देवीलाल की विरासत से जुड़कर बसपा को मजबूत कर रही हैं।
हरियाणा में बसपा के साथ गठबंधन से जहां इनेलो को नई ताकत मिली है, वहीं प्रदेश में मृतप्रायः बसपा को भी संबल मिला है। 2019 के आम चुनाव के नजरिए से देखें तो इस समय हरियाणा में भाजपाई रणनीतिकारों ने 35 बनाम एक, यानी जाट गैर जाट के आधार पर मत विभाजन की रणनीति अपनाई है। इसके विरोध में इनेलो व बसपा ने मिलकर के कदम बढ़ाया है।
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(जलीस अहसन) महिलाओं के अधिकारों को लेकर देश के दो प्रमुख दल कांग्रेस और भाजपा बरसों से कोरी और बेशर्म राजनीति करते आ रहे हैं। लोकसभा और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण दिलाने को लेकर भाजपा और कांग्रेस की अगुवाई वाली केन्द्रीय सरकारों के दौरान 1996, 1998, 1999 और 2008 में महिला आरक्षण विधेयक लाए गए हैं लेकिन हर बार बिना पारित कराए ये सभी संबंधित लोकसभाओं का कार्यकाल समाप्त होने के साथ ही खुद भी समाप्त हो गए।
हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने राजनीति का तीर छोड़ते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पेशकश की है कि वे इस विधेयक को पारित कराने के लिए नए सिरे से संसद को दोनों सदनों में लाए तो कांग्रेस उसका बिना शर्त समर्थन करेगी। इस राजनीतिक तीर का पलटवार भी सियासी होना ही था। मोदी सरकार की ओर से राहुल को जवाब आया कि वह सहर्ष ऐसा करने को तैयार है बशर्ते कांग्रेस पार्टी महिला आरक्षण विधेयक के साथ ही ट्रिपल तलाक़, बहु-विवाह और निकाह हलाला विधेयकों को भी पारित कराने में सहयोग करे। मामला साफ है। दोनों राष्ट्रीय दलों को महिला अधिकारों से नहीं, केवल राजनीति से मतलब है।
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(आशु सक्सेना) 16 वीं लोकसभा का 15 वें सत्र (मॉनसून सत्र) का पहला सप्ताह छोटे पर्दे पर तीन दिन तक लगातार चले एपिसोड का सत्तारूढ़ मोदी सरकार के लिए नि:संदेह सुखद अंत है। सरकार ने विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव के खिलाफ़ 126 मतों के मुकाबले में 325 मत हासिल करके संसद के भीतर अपना बहुमत साबित कर दिया है। सरकार के लिए सुखद यह है कि उसे इस शक्ति परीक्षण में जहां दक्षिण से एक नया साथी एआईडीएमके मिला है। वहीं सरकार के लिए झटका यह है कि दक्षिण का एक साथी टीडीपी ने चार साल समर्थन देने के बाद नाता तोड़ लिया है। अविश्वास प्रस्ताव के बहाने लोकसभा में हुए इस शक्ति परीक्षण में पीएम मोदी के लिए सबसे बड़ा झटका भाजपा के सबसे पुराने सहयोगी शिवसेना का मतदान में हिस्सा ना लेना है।
बहरहाल, लोकसभा से छोटे पर्दे पर चले 'मोदी सरकार के चार साल' एपिसोड की शुरूआत मॉनसून सत्र के पहले दिन 18 जुलाई 2018 को अप्रत्याशित रुप से लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन के आंध्र प्रदेश विभाजन पर टीडीपी के अविश्वास प्रस्ताव को मंजूरी देने से हुई । यह तय हो गया कि शुक्रवार 20 जुलाई की देर शाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अविश्वास प्रस्ताव पर सदन में हुई बहस का जबाव देंगे।
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नई दिल्ली (आशु सक्सेना): लोकसभा में नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर बहस चल रही है। इस प्रस्ताव पर अगर सदन में मतदान हुआ, तो नतीजा मोदी सरकार के पक्ष में आना तय है, बहुमत का आंकड़ा भाजपा अपने बूते पर हासिल करने की स्थिति में है। सवाल यह है कि संसदीय कार्यमंत्री के दावे के मुताबिक एनडीए के पक्ष में 314 मत पड़ते हैं या इस संख्या में कमी होती है। यह कमी ही नैतिक रुप से मोदी सरकार हार को परिलक्षित करेगी। संसद में इस शक्ति परीक्षण के बाद 2019 के लोकसभा चुनाव के मुद्दे और संभावित गठबंधन की तस्वीर भी काफी हद तक साफ हो जाएगी।
मोदी सरकार ने अप्रत्याशित रुप से मॉनसून सत्र की शुरुआत दिलचस्प ढ़ंग से करवाई है। सरकार ने चुनावी माहौल के बीच सत्र की शुरुआत अविश्वास प्रस्ताव की है। इस चर्चा का जबाव पीएम मोदी को देना है। समूचा विपक्ष पीएम मोदी से श्मशान-कब्रिस्तान, मॉब लिंचिंग जैसे मुद्दों पर जबाव की मांग करेगा। इन मुद्दों पर संसद में पीएम मोदी के बयान पर सदन का मूड तैयार होगा। विपक्ष प्रस्ताव पर मतदान की स्थिति में उसके हश्र से वाकिफ़ है।
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