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(आशु सक्सेना): संसद के मॉनसून सत्र का पहला दिन हंगामें की भेंट चढ़ गया। संसद के दोनों सदनों यानि लोकसभा और राज्यसभा में हंगामें के चलते कोई कामकाज नहीं हुआ। सुबह 11 बजे शुरू हुए दोनों सदनों में जंतर मंतर पर चल रहे छात्रों के प्रदर्शन का मुद्दा छाया रहा। छह बार लोकसभा और सात बार राज्यसभा में स्थगन के बाद सदन की कार्यवाही को मंगलवार सुबह 11 बजे तक के लिए स्थगित कर दिया गया है। मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए इस बात की संभावना कमी है कि मॉनसून सत्र के पहले सप्ताह संसद की कार्यवाही एजेंड़े के मुताबिक चल सकेगी।

विपक्ष छात्रों की समस्यों के साथ ही अयोध्या में राम मंदिर के चढ़ावे की चोरी मामले में भी प्रधानमंत्री मोदी पर ​सीधे निशाना साधे हुए है। विपक्ष की मांग है कि राम ​मंदिर में चोरी के मामले की पीएम मोदी ज़िम्मेदारी लें और निष्पक्ष जांच करवा कर दोषियों को दंड़ित करने का काम करें। राम मंदिर के अलावा विपक्ष देश की ​अर्थ व्यवस्था को लेकर भी मोदी सरकार के खिलाफ मुहिम छेड़े हुए है।

इन सभी मुद्दों पर सदन में चर्चा को लेकर पक्ष और विपक्ष के बीच जल्दी ही कोई सहमति बनेगी। अभी तक ऐसे संकेत सरकार ने नहीं दिए है।

विपक्ष संसद के दोनों सदनों में काम रोको प्रस्ताव के तहत शिक्षा समेत तमाम मुद्दों पर चर्चा की मांग कर रहा है। लेकिन सरकार काम रोको प्रस्ताव के तहत चर्चा के लिए राजी नहीं है। लिहाजा संसद के दोनों सदनों में गतिरोध खत्म होने की संभावना बहुत कम है।

मॉनसून सत्र के दौरान संसद भवन से मात्र कुछ कदम दूर देश के तमाम ज्वलंत मुद्दों को लेकर युवा आंदोलित है। यूं तो जंतर मंतर पर प्रदर्शन की इजाजत सीजेपी को ​दी गयी थी। लेकिन अब वहां वामपंथी छात्र संगठनों और कुछ सामाजिक संगठनों ने डेरा डाल दिया है। लिहाजा अब यहां से आंदोलनकारियों को हटाने के लिए पुलिस को बल प्रयोग करना होगा। चूंकि प्रदर्शनकारी शांतिपूर्ण धरना दे रहे हैं। लिहाजा पुलिस बल का प्रयोग मौजूदा हालात में करना संभव नहीं है।

आपको याद दिला दें कि शाहीन बाग आंदोलन भी प्रतीकात्मक शुरू हुआ था और देखते ही देखते वह जनान्दोलन बन गया था। सुप्रीम कोर्ट ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के पक्ष में फैसला दिया था। यह आंदोलन अचानक कोरोना काल आ जाने से खत्म हो गया था। जबकि किसान आंदोलन को केंद्र सरकार और बीजेपी शासित राज्य सरकारों ने पूरी तरह कूचलने की कोशिश की। किसानों को दिल्ली में प्रवेश नहीं करने दिया गया था। लेकिन जंतर मंतर पर आंदोलनकारियों का कब्जा हो चुका है। यह आंदोलन अब थमने वाला नहीं हैख।

सोनम वांगचुक की शिक्षा के ​अलावा लद्दाख बचाओ की मांग भी पुरानी है। सोनम वांगचुक 22 दिनों से भूख हड़ताल पर है। उनकी भूख हड़ताल के बारे में आज कोई जानकारी नहीं मिली है। वहीं जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने घोषणा की थी कि जम्मू कश्मीर को पूर्ण राज्य के दर्जें की मांग को लेकर 20 जुलाई से दिल्ली के जंतर मंतर पर प्रदर्शन किया जाएगा। चलों संसद मार्च के चलते जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री के प्रदर्शन के एलान की ज़मीनी हकीकत क्या रहीं। उन्होंने कहा था कि 12 जुलाई को पार्टी ने दिल्ली में विरोध प्रदर्शन का फैसला किया था और पार्टी अपने फैसले पर कायम है।

संविधान के अनुच्छेद 370 को रद्द करने के बार यह पहला मौका है, इस राज्य का मुद्दा गरमाया हुआ है। सरकार ने 5 अगस्त को अनुच्छेद 370 को खत्म किया था। लिहाजा यह मुद्दा 5 अगस्त तक गरमाया रहेगा। सोनम वांगचुक की लद्दाख बचाओ और लद्दाख को राज्य के दर्जे की मांग अब गरमा सकती है।

देखना यह है कि संसद के मॉनसून सत्र में सरकार किन विधेयकों को बिना चर्चा के पारित करवाने में सफल होगी है। इसके अलावा केंद्र शासित जम्मू कश्मीर और लद्दाख राज्य के लोगों की किन मांगों को सरकार मानती है।

संसद का मॉनसून सत्र शुरू होने से पहले मोदी सरकार ने कॉकरोज जनता पार्टी (सीजेपी) को जंतर मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति देकर अपने लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर ली है। सत्र के दौरान संसद भवन के नज़दीक जंतर मंतर पर सरकार विरोधी नारेबाजी जारी रहेगी।

 

 

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