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(अनिल शुक्ल) ख़लीफ़ा का जन्मदिन ज्येष्ठ माह में पड़ता था, उनकी मां उन्हें बताया करती थीं। तिथि और दिन उनकी मां को नहीं याद था तो ख़लीफ़ा को कहाँ से याद रहता। जेठ के महीने का वो लम्बे समय से इंतज़ार करते। मुझे भी जेठ के आगमन से पूर्व वह अकसर उकसाया करते थे। जेठ का महीना आते ही हम उनका जन्म दिन मनाने की तयारी शुरू कर देते। कोई अच्छी सी ब्रांड की व्हिस्की की बोतल खोली जाती। मैं, ख़लीफ़ा और हम लोगों के 'गैंग' का कोई न कोई सदस्य। राकेश तो ख़ैर था ही पेशेवर हलवाई उसकी तो बात ही क्या, उनके बाकी चेलों में भी कोई न कोई गर्मागर्म पकौड़ियाँ तलना ज़रूर जानता। स्टोव जलाया जाता और ख़लीफ़ा की कोठरी कढ़ैया के कच्ची घानी तेल की महक में सराबोर हो जाती।
उनका स्वास्थ थोड़ा गड़बड़ रहता, इसलिए मेरी नज़र उनके पेगों पर रहती। मुझे चिंता रहती कि कहीं ज़्यादा न हो जाय। मैं थोड़ी बेइमानी करता और उन्हें 40-45 एमएल का ही पेग पानी मिलाकर दे देता। 'हैप्पी बर्थ डे ख़लीफ़ा ' का नारा उछलता और 'पार्टी' शुरू हो जाती। ग्लूकोमिया की वजह से वह देख नहीं पाते थे लेकिन पहला 'सिप' चखते ही पूछते "कहाँ से लाये हो? कुछ नक़ली सी दीखे? मैं और पार्टी में मौजूद बाकी लोग असहमति जताते।
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(अनिल शुक्ल, रंगकर्मी) प्रेमचंद का गाँव यानि वाराणसी ज़िले (उप्र०) का लमही गाँव! बीते इतवार (8 अक्टूबर) की सांझ हम प्रेमचंद के गाँव में थे। हम यानि रंगलीला 'कथावाचन’ की रंगमंडली। यह मुंशी प्रेमचंद की 81वीं पुण्यतिथि का दिन था। मई माह में जिस दिन 'कथावाचन' के तहत मैंने प्रेमचंद की कहानियों की प्रस्तुतियों का निर्णय लिया था तब कल्पना भी नहीं की थी कि किसी दिन इन प्रस्तुतियों को लेकर 'कथा सम्राट' की उस धरती तक भी जाना होगा जहां उनका जन्म हुआ और जहां रहकर उन्होंने कलम पकड़ना सीखा। एक निर्देशक के तौर पर मैं तो बेतरह 'एक्साइटेड' था ही, मेरी अभिनेत्रियां और अभिनेता भी कम उत्तेजित नहीं थे।
वाराणसी से लमही रास्ते में मैंने सोनम से पूछा- “अपने लेखक के गांव जाते हुए उसकी कथा नायिका को कैसा लग रहा है?” अपने बाएं होठ को थोड़ा सा नीचे खींच कर वह मुस्करायी। कुछ देर सोचती रही, फिर बोली- “अभिनेत्री से ज़्यादा मेरे लिए यह महत्व की बात है कि जिस लेखक की कहानियों को मैं बचपन से पढ़ती आ रही हूं, आज उनका गांव, उनका घर उनकी धरती को छूकर महसूस कर सकूंगी। उसने उलट कर मुझसे सवाल किया- आपको कैसा महसूस हो रहा है? टैक्सी के बैक मिरर में उसने मेरा अक्स देखा। "किसी सोच में डूब गए हैं सर?"
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कवि और गीतकार गोपाल दास नीरज शब्दों के ऐसे चितेरे कि उनके व्यक्तित्व को शब्दों में बांधना मुश्किल, वाचिक परंपरा के ऐसे सशक्त हस्ताक्षर कि मंच पर उनकी मौजूदगी लोगों को गीत और कविता सुनने का शऊर सिखा दे, जिंदादिली ऐसी कि शोखियों में फूलों का शबाब घोल दें और मिजाज ऐसा मस्तमौला कि कारवां गुजर जाने के बाद लोग गुबार देखते रहें। उनके जाने से हिंदी साहित्य का एक भरा भरा सा कोना यकायक खाली हो गया। वह अपने चाहने वालों के ऐसे लोकप्रिय और लाड़ले कवि थे जिन्होंने अपनी मर्मस्पर्शी काव्यानुभूति तथा सरल भाषा से हिन्दी कविता को एक नया मोड़ दिया और उनके बाद उभरे बहुत से गीतकारों में जैसे उनके ही शब्दों का अक्स नजर आता है।
गोपालदास सक्सेना ‘नीरज’ का जन्म 4 जनवरी 1924 को इटावा जिले के पुरावली गांव में हुआ। मात्र छह साल की उम्र में पिता ब्रजकिशोर सक्सेना नहीं रहे और उन्हें एटा में उनके फूफा के यहां भेज दिया गया। नीरज ने 1942 में एटा से हाई स्कूल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और परिवार की जिम्मेदारी संभालने इटावा वापस चले आए। गोपाल दास रोजी रोटी की तलाश में निकले तो शुरुआत में इटावा की कचहरी में कुछ समय टाइपिस्ट का काम किया उसके बाद सिनेमाघर की एक दुकान पर भी नौकरी की। कुछ समय बाद वह भी जाती रही तो छोटे मोटे काम करके जैसे तैसे मां और तीन भाइयों के लिए दो रोटी का जुगाड़ किया।
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इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में आयोजित जश्न-ए-अदब महोतस्व में शनिवार को सुप्रसिद्ध साहित्यकार शानी को प्रमचंद के बाद सबसे बड़ा साहित्यकार बताते हुए मशहूर आलोचक और लेखक डॉ. जानकी प्रसाद शर्मा ने कहा कि साहित्यकार तो अपने-अपने समय में बहुत हुए है, लेकिन शानी एकलौते एसे साहित्यकार थे जो अपनी बात तो कह देना ही नहीं, बल्कि उसकी सच्चाई और गहराई को नाप लेना भी उतना ही उचित समझते थे।
समारोह में ''शानी के कथा साहित्य की प्रासंगिकता'' सत्र पर चर्चा हो रही थी जिसमें शर्मा के अलावा जामिया मिलिया के प्रोफ़ेसर और ऊर्दू के लेखक डॉ. ख़ालिद जावेद, वरिष्ठ पत्रकार महेश दर्पण और शानी के पुत्र तथा वरिष्ठ पत्रकार फ़ीरोज़ शानी ने हिस्सा लिया. सत्र का संचालन करते हुए डॉ. शर्मा ने कहा कि शानी प्रेमचंद्र के बाद सबसे बड़े साहित्यकार के तौर पर सामने आए।
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